Saturday, 10 March 2012

३. "प्रेम-ग्रंथ" आकर्षण-आमंत्रण

३.
"प्रेम-ग्रंथ"

"प्रेम-पाश थे मूक नयन,
सब कह देते थे,
आमंत्रण वे,प्रणयसिक्त
कलरव देते थे,

मधुकलश सरीखे चलती थी,
वह सोमरसों को लगे लजाती,
एक सुगंध का झोंका थी
वह जब-जब आती,

कौन!हाँकता,मेरे मन को,
ले जाता किस ओर रे,
श्याम-सलोनी,साँवल गोरी
थी,मेरी चितचोर रे,

जब हँसती थी वह मधुबन थी,
कुछ कहती थी तो अमृत था,
थी किसी जन्म का पुण्य कदाचित,
सोच-सोच मैं विस्मित था,

कंगन की थी मधुर खनक,
उसकी कोयल सी बोली थी,
वही दीवाली मेरे सुखों की,
मेरे दुखों की होली थी,

बादलों की कालिमा
उसके लरजते केश थे,
बंद किन्तु कँपकँपाते
होठ में संदेश थे,

नासिका उत्कृष्ट थी,
अप्रतिम नयन गंभीर थे,
मोतियों की दंतपंक्ति
सम मचलते क्षीर थे,

गुलाबी पंखुड़ियों सम होठ,
खिले जो प्रातः लाल कली
आमंत्रित करते वे लरज-लरज,
रसीली ज्यों अंगूर फली,

वाणी में सुमधुर हास समेटे,
चाल हंस की भाँति लगी,
झर-झर करता झरना थी वह
कल्पवृक्ष की काँति लगी,

स्फूर्त चेतना मेरी थी,
नवयौवन की अंगड़ाई थी,
नव-प्रभात की पावन वेला
थी,संध्या अलसाई थी,

था चित्त मेरा तब ब्रह्मलीन,
प्रियतमा!मुझे तुम भाती थी,
एक हवा के झोंके से जब
चुनरी उड़-उड़ जाती थी,

शैशविक सौंदर्य था और
बाल्यक्रीड़ा थी चपलता,
प्रौढ़ सी विकसित मना थी
पर युवा मन कब संभलता?"

(लगातार)

संजय कुमार शर्मा

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