Tuesday, 5 February 2013

२९. "प्रेम-ग्रंथ" आकर्षण-आमंत्रण

२९.
"
प्रेम-ग्रंथ"

"
कौन? मेरे कानों में कर
चुपके
से कुछ बोल रहा है,
कौन?
मेरे बंजर तन-मन में
रस
सतरंगे घोल रहा है,

छेड़
रहा है कौन? मीत,
मेरे
अंतस के तार, प्रिए!
अस्फुट
ध्वनि से लगे जागने
मेरे
हृदय रसधार, प्रिए!

कौन?
भाग्य निर्माता मेरा
लेखा-
जोखा लिखने तय है,
कौन?
थामने हाथ मेरा है
नियत,
मुझे संशय अतिशय है,

प्रथम
दृष्टि में देख जिसे
मन
कहता है,'यह अपना है',
देश-
काल-परिस्थितियों का
दास
मनुज, सब सपना है,

लगता
है मन से जो अपना,
वह
ही तुम से छल करता है,
जो
अनल काम को शान्त नहीं
करता,
वह चंचल करता है,

खुलने
लगीं स्वेद-ग्रंथियाँ,
मेरे
तन तापोत्तेजन से,
लगा
दौड़ने हृदय अश्व सम,
तेरे
रति उत्तेजन से,

हुआ
विषहीन पुरूष विषधर मेरा,
धड़कन
बदली,तन लाल हुआ,
डसने
को रति-देह,काम ने
बदला
चोला, व्याल हुआ,

आओ!
आज अभी मिल लें,प्रिय!
कल
क्या हो? यह जाने कौन,
प्रेम-
ग्रंथ में सब कुछ लिखता
संजय,
कैसे रहता मौन,

उद्दाम
लहर,सागर विशाल,
जगती
प्रकृति का अंश सही,
नर-
नारी का मिलन प्राकृतिक,
ब्रह्मचर्य
का ध्वंस नहीं,

तो
आओ तज दो पुष्प, प्रियतमा!
प्रियतम
का श्रृंगार करो,
विधि
निमित्त हम आए धरा
पर,
प्रेम मेरा स्वीकार करो,

हे
शक्ति! समर्पित शिव को होकर,
पृथ्वी
को निर्माण भीख दो,
नारी
से नर की है परिभाषा,
जगती
को यह ब्रह्म-सीख दो,

पढ़
लो! संजय का प्रेमग्रंथ,
ले
लो जीवन रसरंग,प्रीत अब,
कब
तक करता रहूँ प्रतीक्षा,
लगो
हृदय से मेरे मीत अब।।"

(
लगातार)

संजय
कुमार शर्मा

२८.
"
प्रेम-ग्रंथ"

"
तुम मेरे माथे की बिंदिया,
तुम
मेरे हाथ का कंगन हो,
तुम
ही हो संसार, कान्त!
तुम
मेरे हृदय की धड़कन हो,

तुम्हारा
अनल सदृश स्पर्श,
उष्ण
दहके दावानल,श्वाँस,
पूरक
तुम मेरी रिक्ति के नियत,
तेरा
आगमन,मेरा मधुमास,

अहा!
तेरा सौंदर्य देव सम,
स्वर्गिक
मृदु स्पर्श तेरा,
माया
तुमसे सहवास कान्त,
तब
व्यर्थ लगे संघर्ष मेरा,

तेरा
मदमाता भवन प्रवेश,प्रिए,
मैं
मृदुल छटा,तुम अश्व बली,
खुलते
सब लगे कपाट मेरे,
मैं
धैर्य धीर,तुम श्याम छली,

सागर
सम गहरी आँखें,
दैदीप्य-
दीप्त,वीरोचित मुख,
लौह
तेरी बाँहों का आश्रय,
कान्ता
का ईहलौकिक सुख,

कमर
शंकु,छाती पर्वत,
जाँघें
प्रबलित, द्रुमअंश,
लता
लिपट चाहे तुमसे
अवलंबन,
उन्नत वंश,

चाल
तुम्हारी सिंह जैसी,
सम
हिरण तुम्हारा रूप,
तेरी
दृष्टि मधुरस वर्षा,
ऋतुशीत
खिले ज्यों धूप,

तलवार
धार सम भाव तेरे,
अति
मधुरिम दीर्घ कटाक्ष,
रति
मेरी आतुर, प्रियतम!
कब?
होंगे काम समाक्ष,

भौंहें
कटार,उन्नत ललाट,
सुतवा
ग्रीवा,नासिका पुष्ट,
सुगठित
अंग-प्रत्यंग,कान्त!
स्पर्श
पूर्ति,नायिका तुष्ट,

हे
काँत! कामिनी मैं कोमल,
है
मेरा निवेदन सुनो! तनिक,
मैं
मीत मदिर-मद-मृदुल-मधुर,
संग
मेरे नीड़,तुम बुनो तनिक,

सर्वप्रथम
जब दृष्टि पड़ी थी
तुम
पर मेरी,कान्त मेरे!
उसी
समय से आँदोलित
जाने
क्यों हैं,सब प्रान्त मेरे,

तुम
मानिन्द लहर,प्रियतम!
आओ
छू लो सब द्वीप मेरे,
दे
दो कुछ मोती अमूल्य,
अब
आशान्वित सद्सीप मेरे।।"

(
लगातार)

संजय
कुमार शर्मा

२७. "प्रेम-ग्रंथ" आकर्षण-आमंत्रण


२७.
"
प्रेम-ग्रंथ"

"
यह मेरा कौमार्य और
मेरा
शील,मेरे अक्षय धन हैं,
काम! तेरी कैसी माया,
विचलित,
चंचल यह रति मन है,

यह
तुमसे है अनुरोध प्रियतम!
मुझसे
छल तुम मत करना,
यदि
अक्षत यौवन मेरा क्षत हो,
तो
मांग मेरी तुम ही भरना,

कैसा
यह प्रकृति का परिहास,
तेरा
वह कामदेव अनुहार,
मनु!
तेरा प्राणिश्रेष्ठ सौंदर्य,
हिला
दे रति-पर्वत के द्वार,

कौन?
छेड़ता मेरे हृदय के तार,
विकरित
कैसा सुमधुर संगीत,
वह
तेरी माया! तन सौष्ठव,
जग
जाएँ, सुप्त हृदय के प्रीत,

आओ,
द्रुम सम वक्षाश्रय दो,
मैं
मृदुल लता,प्रार्थना मेरी,
कांतकामिनी
कोमल रतिहत्,
आक्रांत,
कांत! कामना मेरी,

हे
पुरुष! मेरी नारी का संबल,
तेरा
प्रेम,अभिमान मेरा,
जग
कहे मुझे जब तेरी भामिनी,
बढ़ता
है सम्मान मेरा,

भलीभाँति
अभिज्ञात मुझे,
मेरी
निष्ठा, तेरा बल है,
और
मेरा सर्वांग समर्पण,
युवा
पुरुष! तेरा जल है,

प्रियतम!
मैं लिखती हूँ जग में,
तेरे
पौरुष की परिभाषा,
सब
कुछ न्यौछावर करती हूँ,
प्रतिदान!
न्याय की प्रत्याशा,

तेरे
प्रिय सिन्दूर दान से
गर्वोन्मत
मेरा माथा,
मैं
विष्णुप्रिया, तुम नारायण,
और
प्रेमग्रंथ,संजय! गाथा,

तुम
मेरी भोर,तुम मेरा दिवस,
तुम
सांध्य अर्चना,दीप मेरे,
तुम
प्रेमसिक्त समभोग निशा,
तुम
तमसकाल संदीप मेरे,

तेरी
सेवा संसार मेरा,
तुम
स्वामी,मैं तुम्हरी दासी,
तुम
प्रेम करो या तजो मुझे,
प्रिय!
मैं संतोषी,विश्वासी,

तुम
कवच मेरे,मैं तेरा जीव,
यदि
मैं मोती तुम मेरे सीप,
तुम
राजभवन,मैं तेरी नींव,
मैं
लहर बड़ी,तुम मेरे द्वीप।।"

(
लगातार)

संजय
कुमार शर्मा